"You have your way. I have my way. As for the right way, the correct way, and the only way, it does not exist."
— Friedrich Nietzsche
— Friedrich Nietzsche
Sunday, July 21, 2024
सुशांत के लिए
🦋
खुद को मरते देखना और
खुद को मारना
बहुत लंबी प्रक्रिया है,
और उससे भी लंबी है वो पुकार
जिसे शब्द नहीं मिलते।
अगर आप बचाना चाहते हैं मुझे
सिर्फ एक दिन में
तो बहुत कम बचूंगा मैं,
और उतना सा मैं
तस्वीरों से बाहर न आ पाउँगा।
रस्सी बन जाती है एक दिन में,
मगर उसके रेशे चिपकते हैं रोज
कई सालों तक बेआवाज,
इसलिये जल्दबाज़ी में
बचाने और बचने की कसमें
खाने से पहले,
उस सुरंग का रास्ता समझ लीजिए
जो बहुत लंबी है
बहुत गहरी है
बहुत अंधेरी है।
(सुशांत के लिए)
~ विवेक/ 16/06/2020
Friday, April 30, 2021
मुझसे पूछ के मिली होतीं
तो मैं अपने चेहरे पर लगवाता
दुनिया की सबसे उदास आँखें,
उन सब की तरफ से भी रो सकता
जिन्हें मोहलत नहीं, सहूलियत नहीं
ठहर कर अपने घाव देखने की।
हलक में अटकी हुई अपनी कहानियां
हमारे कान बंद कर देती हैं,
हम नहीं सुन पाते
किसी की काली स्लेट को
चमकीले रंगों से कितनी चोट लगती है।
पूछ कर आँखों में झांक लो
चमक जाती है हल्की सी नमी,
और कितने बरस हो गए किसी ने
कस कर गले नहीं लगाया,
सब पता चल जाता है।
बस ठहरना है खामोशी से।
घाव को पता होता है
दूसरे घाव का पता,
एक को मरहम दो तो
दूसरे तक रिस जाएगा अपने आप
वहाँ तक जाने का अब कोई और रास्ता नहीं।
दुःख की स्याही सब एकरंगी,
अपना-पराया कम-ज्यादा सब बेमानी,
ये जान लेंगे हम जिस दिन,
हमें चिट्ठियां लिखनी आ जाएंगी।
तूफान के उस पार पहुँच
सिर्फ कुनबों के शरीर मत गिनना,
क्योकि जब देह गिरती रहती है आग में,
इंसान के इंसान बने रहने की लड़ाई भी चलती है।
सबकुछ नहीं बचेगा वैसा ही
मगर आईने बचे रहेंगे,
उनकी याददाश्त परेशान करेगी
और मुझे यकीन है
आने वाली नस्लें एक दिन लिखेंगी
की जश्न के नशे में
हमनें क्या सींचा था?
और त्रासदी में बदहवास
हम क्या बचा पाए?
~
#नोट्स
बोधिसत्व विवेक
30.04.2021
Sunday, October 13, 2019
मैं हमेशा से बनना चाहता था,
तुम्हारे लिए
एक बड़ा सा पेड़।
इतना बड़ा की
तुम्हारी हर परेशानी
छोटी लगने लगे.
जब तुम्हे धूप लगे
मैं छाँव दे दूं,
भूख पर
चुपके से मीठे फल गिरा दूँ,
और प्यास पर
पत्तो में संजोई ओस.
सुना दूँ सबसे मीठी लोरी
गुजरती हुई हवाओं के मार्फ़त,
और सुला दूं
अपनी शाखों के झूले में,
ठीक उस कहानी के बाद
जिसमें मैं जिंदगी को
खूबसूरत सपने का सच होना
कह देता हूँ।
मैं जो चाहता हूँ,
वो हमेशा नहीँ होता
बिल्कुल वैसा ही,
और ये न होना
मेरा वजूद है तब तक,
जब तक तुम भूल न जाओ
ये कविता !
- विवेक 21.08.2018
तुम्हारे लिए
एक बड़ा सा पेड़।
इतना बड़ा की
तुम्हारी हर परेशानी
छोटी लगने लगे.
जब तुम्हे धूप लगे
मैं छाँव दे दूं,
भूख पर
चुपके से मीठे फल गिरा दूँ,
और प्यास पर
पत्तो में संजोई ओस.
सुना दूँ सबसे मीठी लोरी
गुजरती हुई हवाओं के मार्फ़त,
और सुला दूं
अपनी शाखों के झूले में,
ठीक उस कहानी के बाद
जिसमें मैं जिंदगी को
खूबसूरत सपने का सच होना
कह देता हूँ।
मैं जो चाहता हूँ,
वो हमेशा नहीँ होता
बिल्कुल वैसा ही,
और ये न होना
मेरा वजूद है तब तक,
जब तक तुम भूल न जाओ
ये कविता !
- विवेक 21.08.2018
Thursday, August 15, 2019
दुकान पर मिठाई खरीदते वक़्त,
मेरी तरह शायद सब यही प्रार्थना कर रहे थे,
की खोया नकली तो होगा ही,
बस ज़्यादा जहरीला न हो,
वैसे भी ज्यादा खरीद न पाएंगे.
वापस लौटते वक़्त मख्खियों से
बचाते हुए, कीचड़ से बचते हुए,
घर पहुँच जाना,
आज की उपलब्धि है.
मजदूरी के दो दिनों के बीच,
फँसा हुआ ये दिन,
त्योहार कहे जाने के लिए तड़प रहा है,
लेकिन हम इस झाँसे में नहीं आयेंगे,
हमें गणित आता है,
तनख्वाह आने के पहले,
हर रोज की लक्ष्मण रेखा,
हमनें खींच रखी है,
खुशी से झूमते वक़्त
हमारा पैर
गलती से भी इसके बाहर न जायेगा.
हम उल्टा त्योहार को ललचा देंगे,
ऐसा स्वांग रचायेंगे की
सबको यकीन हो जाये,
हमने चतुराई से
जीना सीख लिया है !!!
- विवेक (15.08.19)
मेरी तरह शायद सब यही प्रार्थना कर रहे थे,
की खोया नकली तो होगा ही,
बस ज़्यादा जहरीला न हो,
वैसे भी ज्यादा खरीद न पाएंगे.
वापस लौटते वक़्त मख्खियों से
बचाते हुए, कीचड़ से बचते हुए,
घर पहुँच जाना,
आज की उपलब्धि है.
मजदूरी के दो दिनों के बीच,
फँसा हुआ ये दिन,
त्योहार कहे जाने के लिए तड़प रहा है,
लेकिन हम इस झाँसे में नहीं आयेंगे,
हमें गणित आता है,
तनख्वाह आने के पहले,
हर रोज की लक्ष्मण रेखा,
हमनें खींच रखी है,
खुशी से झूमते वक़्त
हमारा पैर
गलती से भी इसके बाहर न जायेगा.
हम उल्टा त्योहार को ललचा देंगे,
ऐसा स्वांग रचायेंगे की
सबको यकीन हो जाये,
हमने चतुराई से
जीना सीख लिया है !!!
- विवेक (15.08.19)
Saturday, April 27, 2019
Wednesday, April 24, 2019
ताज़्ज़ुब है,
इतना वक़्त मैंने
खुद को सही साबित करने में क्यो लिया,
जबकी बीच बहस छोड़ कर
मैं दोपहर की नींद ले सकता था !
बहुत उदास हूँ
ये सोचकर भी,
की इतनी स्याही
नसीहतों को रंगने में क्यो खर्च की,
जबकी उससे
लिख सकता था खूबसूरत कवितायें
दुनिया के हर बच्चे के लिए !
इसलिये,
मैं अब हर दोपहर
सोना चाहता हूँ,
हर रात
लिखना चाहता हूँ !
- विवेक (24.04.19)
इतना वक़्त मैंने
खुद को सही साबित करने में क्यो लिया,
जबकी बीच बहस छोड़ कर
मैं दोपहर की नींद ले सकता था !
बहुत उदास हूँ
ये सोचकर भी,
की इतनी स्याही
नसीहतों को रंगने में क्यो खर्च की,
जबकी उससे
लिख सकता था खूबसूरत कवितायें
दुनिया के हर बच्चे के लिए !
इसलिये,
मैं अब हर दोपहर
सोना चाहता हूँ,
हर रात
लिखना चाहता हूँ !
- विवेक (24.04.19)
Sunday, March 31, 2019
मुझे बताया नहीं गया
मुझे पता चला
बहुत धीरे-धीरे
बहुत देर से
कि मैं अकेला नहीं हूँ!
मैं लिखता रहा रात भर
बुरी खबरें
और सुबह नहाते वक़्त
खुद को तैयार करता रहा
किसी एक खबर के लिए,
फिर देर रात खुश होता रहा
कि सब खबरें झूठी थी!
सफर पर निकलते वक़्त
तय करता रहा दुर्घटना का समय,
शरीर के हर इशारे को
दिया सबसे भयंकर नाम,
सोचता रहा
कौन रोयेगा मेरा मातम और कैसे?
और ऐसे नाटक लिखता रहा
जिसमें धड़कने आँसुओ हार जाती हैं।
मैंने लगाए सबसे दुःखद कयास,
जब घर पर किसी ने फोन न उठाया,
और खुश होते वक़्त डर के मारे
बड़ी सावधानी रखी
कि दुःखी होना न भूल जाऊ।
कोई खूबसूरत चीज, चेहरा, पल
नहीं लिया दोनों हाँथो में एक साथ,
और सबसे अच्छी तस्वीरों को
बचाता रहा खुद से,
जैसे आने से पहले ही ख़त्म
हो जाएगा सब कुछ,
इसलिए मेरे सबसे
उम्मीद भरे सपनो ने
परेशान किया सारी रात।
मैंने मदद माँगी
तो मुझसे कहा गया
की मैं गढ्ढे में गिरा हुआ हूँ,
मुझे बाहर आना चाहिए
जहाँ बड़ी रोशनी है,
ये सुनकर
मैंने इंतज़ार किया
मगर कोई सीढ़ी, कोई रस्सी
नहीँ आयी,
क्योकि सारी आवाज़े तो
वहीं साथ बैठी थीं।
मैंने दीवार पर लिख रखा था कि
'एक दिन मरेंगे हम सब, लेकिन
उससे पहले हर दिन जिएंगे'
और मैं इंतज़ार में ही रह गया
की कोई मुझे छूकर
यकीन दिलाये ये सब।
अधखुली आंखों से देखता हूँ,
मैं एक भीड़ में हूँ,
भीड़ घुप्प अंधेरे में है,
सब अकेले हैं,
इतने चिपके हुए हैं की
जगह ही नहीं
एक दूसरे को छूने की,
सबके पास वही मरहम है,
सबके पास वही इंतज़ार है,
ऊपर से आने वाली
किसी सीढ़ी का, किसी रस्सी का,
किसी रोशनी का !
- विवेक (31.03.19)
मुझे पता चला
बहुत धीरे-धीरे
बहुत देर से
कि मैं अकेला नहीं हूँ!
मैं लिखता रहा रात भर
बुरी खबरें
और सुबह नहाते वक़्त
खुद को तैयार करता रहा
किसी एक खबर के लिए,
फिर देर रात खुश होता रहा
कि सब खबरें झूठी थी!
सफर पर निकलते वक़्त
तय करता रहा दुर्घटना का समय,
शरीर के हर इशारे को
दिया सबसे भयंकर नाम,
सोचता रहा
कौन रोयेगा मेरा मातम और कैसे?
और ऐसे नाटक लिखता रहा
जिसमें धड़कने आँसुओ हार जाती हैं।
मैंने लगाए सबसे दुःखद कयास,
जब घर पर किसी ने फोन न उठाया,
और खुश होते वक़्त डर के मारे
बड़ी सावधानी रखी
कि दुःखी होना न भूल जाऊ।
कोई खूबसूरत चीज, चेहरा, पल
नहीं लिया दोनों हाँथो में एक साथ,
और सबसे अच्छी तस्वीरों को
बचाता रहा खुद से,
जैसे आने से पहले ही ख़त्म
हो जाएगा सब कुछ,
इसलिए मेरे सबसे
उम्मीद भरे सपनो ने
परेशान किया सारी रात।
मैंने मदद माँगी
तो मुझसे कहा गया
की मैं गढ्ढे में गिरा हुआ हूँ,
मुझे बाहर आना चाहिए
जहाँ बड़ी रोशनी है,
ये सुनकर
मैंने इंतज़ार किया
मगर कोई सीढ़ी, कोई रस्सी
नहीँ आयी,
क्योकि सारी आवाज़े तो
वहीं साथ बैठी थीं।
मैंने दीवार पर लिख रखा था कि
'एक दिन मरेंगे हम सब, लेकिन
उससे पहले हर दिन जिएंगे'
और मैं इंतज़ार में ही रह गया
की कोई मुझे छूकर
यकीन दिलाये ये सब।
अधखुली आंखों से देखता हूँ,
मैं एक भीड़ में हूँ,
भीड़ घुप्प अंधेरे में है,
सब अकेले हैं,
इतने चिपके हुए हैं की
जगह ही नहीं
एक दूसरे को छूने की,
सबके पास वही मरहम है,
सबके पास वही इंतज़ार है,
ऊपर से आने वाली
किसी सीढ़ी का, किसी रस्सी का,
किसी रोशनी का !
- विवेक (31.03.19)
Friday, March 22, 2019
परदेसी हो,
तो ध्यान रखना.
घर जाके
अपना सामान मत फैला देना
चारो तरफ,
अपने आने की खबर की तरह.
घर की जमीन
बड़ी उपजाऊ होती है.
दो दिन में ही हर चीज
जड़ जमा लेती है,
उग आते है
छोटी-छोटी पत्तियां और फूल.
फिर लौटते वक़्त
आसान नहीं होता
उजाड़ना ये बागीचा,
और घर हाथ पकड़ कर रोकता है
हर पौधे को.
हाथ छुड़ा कर
वापस लौटने का ये अफ़सोस,
परत दर परत इकठ्ठा हो रहा है,
इतनी परतों के नीचे
कितनी सांसे ले पाओगे?
- विवेक (22.03.19)
तो ध्यान रखना.
घर जाके
अपना सामान मत फैला देना
चारो तरफ,
अपने आने की खबर की तरह.
घर की जमीन
बड़ी उपजाऊ होती है.
दो दिन में ही हर चीज
जड़ जमा लेती है,
उग आते है
छोटी-छोटी पत्तियां और फूल.
फिर लौटते वक़्त
आसान नहीं होता
उजाड़ना ये बागीचा,
और घर हाथ पकड़ कर रोकता है
हर पौधे को.
हाथ छुड़ा कर
वापस लौटने का ये अफ़सोस,
परत दर परत इकठ्ठा हो रहा है,
इतनी परतों के नीचे
कितनी सांसे ले पाओगे?
- विवेक (22.03.19)
Monday, March 11, 2019
Tuesday, February 19, 2019
Wednesday, November 28, 2018
"तुम पिता थे"
तुम्हारे बच्चे भूखे थे,
और उन्हें यक़ीन था
तुम पर,
लेकिन जब तुम
उनके पैसों से,
रोटी की जगह,
अपने ख़ुदा के लिए
फूल खरीद लाये,
तब उन मासूमों ने आँखों से
जो भीगें हुए सवाल दागे,
उससे बहुत बड़ी दरारें पड़ गयीं
तुम्हारे मंदिरों में,
देखो उन दरारों को,
देर मत करो,
शायद उनमें अब भी
इतनी जगह हो,
कि तुम्हारी आत्मा निकल सके बाहर,
और आज़ाद हो जाये !!!
- विवेक (26.11.18)
Tuesday, August 22, 2017
ज़िन्दगी कुछ कह रही थी
एक दिन जब रात की छत टिमटिमा कर गा रही थी.
चाँद की हल्की सी आहट बादलों से आ रही थी.
गुनगुनाती याद उसकी चांदनी पर बह रही थी.
उस घड़ी उस वक़्त शायद ज़िन्दगी कुछ कह रही थी.
एक दिन जब मेरा कमरा सिर्फ मुझको सुन रहा था.
एक झरोखा कोई सपना धूप के संग बुन रहा था.
दो परिंदों की ठिठोली खिडकियों पे रह रही थी.
उस घड़ी उस वक़्त शायद ज़िन्दगी कुछ कह रही थी.
एक दिन जब चार आँखे एक आंसू रो रहीं थी.
खूबसूरत थी उदासी मुस्कुराहट सो रही थी.
रौशनी की हर ईमारत जब क्षितिज पर ढह रही थी.
उस घड़ी उस वक़्त शायद ज़िन्दगी कुछ कह रही थी.
- विवेक (२००१)
Sunday, August 13, 2017
आखिरी पन्ने पे जाके मिला है पहला सबक,
ख्वाहिशे बोने पे अफ़सोस के फूल आते हैं.
घर पे वापस बुला ले कोई इसलिए हर बार,
अपनी कोई चीज़ रख देते हैं, भूल आते हैं.
शहर में आना ही इक जुर्म है इतना गहरा,
कोई गुनाह करे, हम क़ुबूल आते हैं.
रहनुमाओं से सबक सोच-समझ के लेना,
एक ही रंग में साजिश और उसूल आते हैं.
- विवेक
१३.०८.२०१७
ख्वाहिशे बोने पे अफ़सोस के फूल आते हैं.
घर पे वापस बुला ले कोई इसलिए हर बार,
अपनी कोई चीज़ रख देते हैं, भूल आते हैं.
शहर में आना ही इक जुर्म है इतना गहरा,
कोई गुनाह करे, हम क़ुबूल आते हैं.
रहनुमाओं से सबक सोच-समझ के लेना,
एक ही रंग में साजिश और उसूल आते हैं.
- विवेक
१३.०८.२०१७
Thursday, January 7, 2016
‘सुख’
सुख
एटीएम का वो परचा नहीं है
जो महीने की पहली तारीख को निकलता है।
सुख
वो घर भी नहीं
जो परदेस में बसाया हो।
सुख
धूप का वो टुकड़ा है
जो जाड़े की दोपहरी में
बाबा के साथ सोते हुए
उनकी शाल के छेद से आकर
मेरी पीठ सहलाता था।
और जिन्दगी
इक तलाश है,
उसी धूप के टुकड़े की।
एटीएम का वो परचा नहीं है
जो महीने की पहली तारीख को निकलता है।
सुख
वो घर भी नहीं
जो परदेस में बसाया हो।
सुख
धूप का वो टुकड़ा है
जो जाड़े की दोपहरी में
बाबा के साथ सोते हुए
उनकी शाल के छेद से आकर
मेरी पीठ सहलाता था।
और जिन्दगी
इक तलाश है,
उसी धूप के टुकड़े की।
Sunday, December 1, 2013
चोर-पुलिस
चुनाव के बाद मुमकिन है
बदल जाये बहुत कुछ.
चोर बन जाए पुलिस,
और पुलिस पहन ले चोर की पोशाक.
पर नहीं बदलेंगे
लूटे जाने वाले,
और जिंदा रहेगी,
नए तरीकों से
लुटने की तमन्ना !
...चलो एक बार फिर से
वोट दे आयें हम-दोनों !
बदल जाये बहुत कुछ.
चोर बन जाए पुलिस,
और पुलिस पहन ले चोर की पोशाक.
पर नहीं बदलेंगे
लूटे जाने वाले,
और जिंदा रहेगी,
नए तरीकों से
लुटने की तमन्ना !
...चलो एक बार फिर से
वोट दे आयें हम-दोनों !
Saturday, August 3, 2013
Wednesday, July 31, 2013
सिनेमा-साक्षरता
स्कूल छोड़ के पहली फिल्म देखी थी ‘कृष्णा’, क्योकि मेरा दोस्त सुनील शेट्टी का जबरदस्त फैन था. मैंने शुरू में बहुत मना किया की मैं नहीं जाऊंगा लेकिन फिर उसने अपनी कसम दे दी और कहा की सिर्फ मेरी वजह से उसका ये सपना पूरा नहीं हो पा रहा है. मैं इतना बर्दाश्त नहीं कर पाया और फिल्म बर्दाश्त करने चला गया उसके साथ छवीमहल में १५ रूपये का टिकट लेके.
उसने ज़िन्दगी में पहली बार सिनेमा-हाल में कदम रखा था और जब इंटरवल में हम बाहर आये तो मुझसे बोला,
“ठीक तो थी, तुम झुठ्ठे नरक मचाये थे, चलो जल्दी चला जाये अब पापा ऑफिस से निकल गए होंगे”
“कहाँ चलें, पूरा नहीं देखोगे क्या?”
“ख़त्म नहीं हुई का ? इ सब लोग कहाँ जा रहे हैं”
“अबे बुद्धि के बलिहारी ! इंटरवल हुआ हैं अभी, जंगल से आये हो का?”
इसके बाद मैंने उसे विस्तार से समझाया और उसने फिर कसम दी की ये बात मैं स्कूल में किसी को नहीं बताऊंगा.
उस दिन के बाद आज बता रहा हूँ. आज विमल के लेख में इसी तरह की बातें पढ़ के याद आ गया.
मुझे याद हैं बचपन में पूरे परिवार के साथ नटराज टाकीज़ में ‘वतन के रखवाले’ देखी थी और बहुत दिनों तक मिथुन का वो सीन याद करता रहा जिसमे वो दीवार पे छिपकली की तरह चढ़ जाता है. उसके बहुत दिनों बाद पापा ने मुझे ‘जुरासिक पार्क’ दिखाई थी. मेरे पिताजी आज भी बहुत शान से बताते हैं की उन्होंने फिल्मिस्तान टाकीज़ में लगने वाली हर फिल्म देखी अपने ज़माने में. सिनेमा और संगीत का चस्का उन्ही का उपहार है मेरे लिए, किताबें से भी दोस्ती उन्होंने ही करायी और आज उसी के कारण ज़िन्दगी के बड़े खुबसूरत एहसास हुए हैं.
मेरे दोस्त के पिताजी भी बड़े फिल्मबाज़ थे अपने ज़माने के, मगर बेटे के लिए अलग मापदंड थे और इसके कारण बेटा बहुत समय तक सिनेमा में अनपढ़ रहा.
वक़्त बदल गया है, केबल टी.वी. का ज़माना है...लेकिन सिनेमा-साक्षर होना उतना ही जरूरी है जितना किताबे पढना. ज़िन्दगी में जो कुछ भी हासिल किया उसमे किताबों और फिल्मो का बहुत बड़ा योगदान हैं और ये उपहार हर माँ-बाप को देना चाहिए अपने बच्चो को...उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए....लेकिन नहीं भी किया तो कोई बात नहीं....स्कूल तो है ही, दोस्त तो तैयार ही हैं....सिनेमा तो ज़िन्दगी का हिस्सा बनेगा ही !!!!!
उसने ज़िन्दगी में पहली बार सिनेमा-हाल में कदम रखा था और जब इंटरवल में हम बाहर आये तो मुझसे बोला,
“ठीक तो थी, तुम झुठ्ठे नरक मचाये थे, चलो जल्दी चला जाये अब पापा ऑफिस से निकल गए होंगे”
“कहाँ चलें, पूरा नहीं देखोगे क्या?”
“ख़त्म नहीं हुई का ? इ सब लोग कहाँ जा रहे हैं”
“अबे बुद्धि के बलिहारी ! इंटरवल हुआ हैं अभी, जंगल से आये हो का?”
इसके बाद मैंने उसे विस्तार से समझाया और उसने फिर कसम दी की ये बात मैं स्कूल में किसी को नहीं बताऊंगा.
उस दिन के बाद आज बता रहा हूँ. आज विमल के लेख में इसी तरह की बातें पढ़ के याद आ गया.
मुझे याद हैं बचपन में पूरे परिवार के साथ नटराज टाकीज़ में ‘वतन के रखवाले’ देखी थी और बहुत दिनों तक मिथुन का वो सीन याद करता रहा जिसमे वो दीवार पे छिपकली की तरह चढ़ जाता है. उसके बहुत दिनों बाद पापा ने मुझे ‘जुरासिक पार्क’ दिखाई थी. मेरे पिताजी आज भी बहुत शान से बताते हैं की उन्होंने फिल्मिस्तान टाकीज़ में लगने वाली हर फिल्म देखी अपने ज़माने में. सिनेमा और संगीत का चस्का उन्ही का उपहार है मेरे लिए, किताबें से भी दोस्ती उन्होंने ही करायी और आज उसी के कारण ज़िन्दगी के बड़े खुबसूरत एहसास हुए हैं.
मेरे दोस्त के पिताजी भी बड़े फिल्मबाज़ थे अपने ज़माने के, मगर बेटे के लिए अलग मापदंड थे और इसके कारण बेटा बहुत समय तक सिनेमा में अनपढ़ रहा.
वक़्त बदल गया है, केबल टी.वी. का ज़माना है...लेकिन सिनेमा-साक्षर होना उतना ही जरूरी है जितना किताबे पढना. ज़िन्दगी में जो कुछ भी हासिल किया उसमे किताबों और फिल्मो का बहुत बड़ा योगदान हैं और ये उपहार हर माँ-बाप को देना चाहिए अपने बच्चो को...उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए....लेकिन नहीं भी किया तो कोई बात नहीं....स्कूल तो है ही, दोस्त तो तैयार ही हैं....सिनेमा तो ज़िन्दगी का हिस्सा बनेगा ही !!!!!
Thursday, June 13, 2013
The lost Paradise !
Coming back from office today, I was standing in the bus reading a book, and next to me was a little girl who started looking at the pages fascinatingly. When i finished reading the story and i was about to turn the page i noticed this girl perspiring profusely in the crowded bus but her eyes were trapped inside the book…I did not turn the page and waited for her to read…and I started reading the joy in her eyes, the innocent curiosity and the sense of wonder on her face…incredible!!!!
It took 5 bus stops to finish as she was reading slowly…and then I asked, “I hope you liked the story. Should I turn the page now?”
She chuckled surprisingly and nodded…we talked for 30 seconds and when I was leaving she said, “Thank you so much for the story”
I asked myself, “Where was my joy and curiosity while reading the same thing? Where did I lose my sense of wonder?”
Little Naina taught me the lesson that we easily forget while running in the endless race of acquiring more and more wealth- If we start enjoying the little blessings every day, if we don’t lose the ability to sense the wonders of life, if we remain human beings and if we keep our inner child alive…….Happiness becomes a way of life!
Anyways…..here is the chapter I was reading from this book- “Who will cry when you die” by Robin Sharma:-
‘Maintain Your Perspective’
One day, according to an old story, a man with a serious illness was wheeled into a hospital room where another patient was resting on a bed next to the window. As the two became friends, the one next to the window would look out of it and then spend the next few hours delighting his bedridden companion with vivid descriptions of the world outside. Some days he would describe the beauty of the trees in the park across from the hospital and how the leaves danced in the wind. On other days, he would entertain his friend with step - by – step replays of the things people were doing as they walked by the hospital. However, as time went on, the bedridden man grew frustrated at his inability to observe the wonders his friend described. Eventually he grew to dislike him and then to hate him intensely. One night, during a particularly bad coughing fit, the patient next to the window stopped breathing. Rather than pressing the button for help, the other man chose do nothing. The next morning the patient who had given his friend so much happiness by recounting the sights outside the window was pronounced dead and wheeled out of the hospital room. The other man quickly asked that his bed be placed next to the window, a request that was complied with the attending nurse. But as he looked out the window, he discovered something that made him shake: the window faced a stark brick wall. His former roommate had conjured up the incredible sights that he described in his imagination as a loving gesture to make the world of his friend a little bit better during a difficult time. He had acted out of selfless love.
This story never fails to create a shift in my own perspective when I think about it. To live happier, more fulfilling lives, when we encounter a difficult circumstance, we must keep shifting our perspective and continually ask ourselves, “Is there a wiser, more enlightened way of looking at this seemingly negative situation?” Stephen Hawking, one of the greatest physicists ever, is reported to have said that we live on a minor planet of a very average star located within the outer limits of one of a hundred thousand million galaxies. How’s that for a shift in perspective? Given this information, are your troubles really that big? Are the problems you have experienced or the challenges you might currently be facing really as serious as you have made them out to be?
We walk this planet for such a short time. In the overall scheme of things, our lives are mere blips on the canvas of eternity. So have the wisdom to enjoy the journey and savor the process.
It took 5 bus stops to finish as she was reading slowly…and then I asked, “I hope you liked the story. Should I turn the page now?”
She chuckled surprisingly and nodded…we talked for 30 seconds and when I was leaving she said, “Thank you so much for the story”
I asked myself, “Where was my joy and curiosity while reading the same thing? Where did I lose my sense of wonder?”
Little Naina taught me the lesson that we easily forget while running in the endless race of acquiring more and more wealth- If we start enjoying the little blessings every day, if we don’t lose the ability to sense the wonders of life, if we remain human beings and if we keep our inner child alive…….Happiness becomes a way of life!
Anyways…..here is the chapter I was reading from this book- “Who will cry when you die” by Robin Sharma:-
‘Maintain Your Perspective’
One day, according to an old story, a man with a serious illness was wheeled into a hospital room where another patient was resting on a bed next to the window. As the two became friends, the one next to the window would look out of it and then spend the next few hours delighting his bedridden companion with vivid descriptions of the world outside. Some days he would describe the beauty of the trees in the park across from the hospital and how the leaves danced in the wind. On other days, he would entertain his friend with step - by – step replays of the things people were doing as they walked by the hospital. However, as time went on, the bedridden man grew frustrated at his inability to observe the wonders his friend described. Eventually he grew to dislike him and then to hate him intensely. One night, during a particularly bad coughing fit, the patient next to the window stopped breathing. Rather than pressing the button for help, the other man chose do nothing. The next morning the patient who had given his friend so much happiness by recounting the sights outside the window was pronounced dead and wheeled out of the hospital room. The other man quickly asked that his bed be placed next to the window, a request that was complied with the attending nurse. But as he looked out the window, he discovered something that made him shake: the window faced a stark brick wall. His former roommate had conjured up the incredible sights that he described in his imagination as a loving gesture to make the world of his friend a little bit better during a difficult time. He had acted out of selfless love.
This story never fails to create a shift in my own perspective when I think about it. To live happier, more fulfilling lives, when we encounter a difficult circumstance, we must keep shifting our perspective and continually ask ourselves, “Is there a wiser, more enlightened way of looking at this seemingly negative situation?” Stephen Hawking, one of the greatest physicists ever, is reported to have said that we live on a minor planet of a very average star located within the outer limits of one of a hundred thousand million galaxies. How’s that for a shift in perspective? Given this information, are your troubles really that big? Are the problems you have experienced or the challenges you might currently be facing really as serious as you have made them out to be?
We walk this planet for such a short time. In the overall scheme of things, our lives are mere blips on the canvas of eternity. So have the wisdom to enjoy the journey and savor the process.
Sunday, April 22, 2012
ज़िंदगी है, मैं नहीं हूँ !
सुबह बुलाने से पहले बुलाओ धूप मुझे,
रौशनी दो, न कहो मुझको सितारा कोई.
मेरी आवाज़ सुनो लौटती ख़ामोशी में,
डूबने दो मुझे मत खीचो किनारा कोई.
ज़िंदगी है, मैं नहीं हूँ कोई लिबास है बस.
जो मेरा है वो खुद को खोने की तलाश है बस.
हर सही का हर गलत का बेरहम क़त्ल करो,
मुझे सवाल बनाओ नया जवाब न दो.
कौन शमशान का रास्ता है कौन ज़न्नत का,
मुझे बनाने दो मुझको कोई हिसाब न दो.
ज़िंदगी है, मैं नहीं हूँ कोई लिबास है बस.
जो मेरा है वो खुद को खोने की तलाश है बस.
प्यार में फ़र्ज़ है कसमें है और सलाखें हैं,
किसे इल्ज़ाम बताऊँ और किसे माफ करूँ.
गर्द पुश्तैनी मिली हैं सजोये रखने को,
मैं अपना चेहरा बनाऊँ या आईना साफ़ करूँ.
ज़िंदगी है, मैं नहीं हूँ कोई लिबास है बस.
जो मेरा है वो खुद को खोने की तलाश है बस.
- विवेक
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