"You have your way. I have my way. As for the right way, the correct way, and the only way, it does not exist."
— Friedrich Nietzsche
— Friedrich Nietzsche
Monday, March 11, 2019
Tuesday, February 19, 2019
Wednesday, November 28, 2018
"तुम पिता थे"
तुम्हारे बच्चे भूखे थे,
और उन्हें यक़ीन था
तुम पर,
लेकिन जब तुम
उनके पैसों से,
रोटी की जगह,
अपने ख़ुदा के लिए
फूल खरीद लाये,
तब उन मासूमों ने आँखों से
जो भीगें हुए सवाल दागे,
उससे बहुत बड़ी दरारें पड़ गयीं
तुम्हारे मंदिरों में,
देखो उन दरारों को,
देर मत करो,
शायद उनमें अब भी
इतनी जगह हो,
कि तुम्हारी आत्मा निकल सके बाहर,
और आज़ाद हो जाये !!!
- विवेक (26.11.18)
Tuesday, August 22, 2017
ज़िन्दगी कुछ कह रही थी
एक दिन जब रात की छत टिमटिमा कर गा रही थी.
चाँद की हल्की सी आहट बादलों से आ रही थी.
गुनगुनाती याद उसकी चांदनी पर बह रही थी.
उस घड़ी उस वक़्त शायद ज़िन्दगी कुछ कह रही थी.
एक दिन जब मेरा कमरा सिर्फ मुझको सुन रहा था.
एक झरोखा कोई सपना धूप के संग बुन रहा था.
दो परिंदों की ठिठोली खिडकियों पे रह रही थी.
उस घड़ी उस वक़्त शायद ज़िन्दगी कुछ कह रही थी.
एक दिन जब चार आँखे एक आंसू रो रहीं थी.
खूबसूरत थी उदासी मुस्कुराहट सो रही थी.
रौशनी की हर ईमारत जब क्षितिज पर ढह रही थी.
उस घड़ी उस वक़्त शायद ज़िन्दगी कुछ कह रही थी.
- विवेक (२००१)
Sunday, August 13, 2017
आखिरी पन्ने पे जाके मिला है पहला सबक,
ख्वाहिशे बोने पे अफ़सोस के फूल आते हैं.
घर पे वापस बुला ले कोई इसलिए हर बार,
अपनी कोई चीज़ रख देते हैं, भूल आते हैं.
शहर में आना ही इक जुर्म है इतना गहरा,
कोई गुनाह करे, हम क़ुबूल आते हैं.
रहनुमाओं से सबक सोच-समझ के लेना,
एक ही रंग में साजिश और उसूल आते हैं.
- विवेक
१३.०८.२०१७
ख्वाहिशे बोने पे अफ़सोस के फूल आते हैं.
घर पे वापस बुला ले कोई इसलिए हर बार,
अपनी कोई चीज़ रख देते हैं, भूल आते हैं.
शहर में आना ही इक जुर्म है इतना गहरा,
कोई गुनाह करे, हम क़ुबूल आते हैं.
रहनुमाओं से सबक सोच-समझ के लेना,
एक ही रंग में साजिश और उसूल आते हैं.
- विवेक
१३.०८.२०१७
Thursday, January 7, 2016
‘सुख’
सुख
एटीएम का वो परचा नहीं है
जो महीने की पहली तारीख को निकलता है।
सुख
वो घर भी नहीं
जो परदेस में बसाया हो।
सुख
धूप का वो टुकड़ा है
जो जाड़े की दोपहरी में
बाबा के साथ सोते हुए
उनकी शाल के छेद से आकर
मेरी पीठ सहलाता था।
और जिन्दगी
इक तलाश है,
उसी धूप के टुकड़े की।
एटीएम का वो परचा नहीं है
जो महीने की पहली तारीख को निकलता है।
सुख
वो घर भी नहीं
जो परदेस में बसाया हो।
सुख
धूप का वो टुकड़ा है
जो जाड़े की दोपहरी में
बाबा के साथ सोते हुए
उनकी शाल के छेद से आकर
मेरी पीठ सहलाता था।
और जिन्दगी
इक तलाश है,
उसी धूप के टुकड़े की।
Sunday, December 1, 2013
चोर-पुलिस
चुनाव के बाद मुमकिन है
बदल जाये बहुत कुछ.
चोर बन जाए पुलिस,
और पुलिस पहन ले चोर की पोशाक.
पर नहीं बदलेंगे
लूटे जाने वाले,
और जिंदा रहेगी,
नए तरीकों से
लुटने की तमन्ना !
...चलो एक बार फिर से
वोट दे आयें हम-दोनों !
बदल जाये बहुत कुछ.
चोर बन जाए पुलिस,
और पुलिस पहन ले चोर की पोशाक.
पर नहीं बदलेंगे
लूटे जाने वाले,
और जिंदा रहेगी,
नए तरीकों से
लुटने की तमन्ना !
...चलो एक बार फिर से
वोट दे आयें हम-दोनों !
Saturday, August 3, 2013
Wednesday, July 31, 2013
सिनेमा-साक्षरता
स्कूल छोड़ के पहली फिल्म देखी थी ‘कृष्णा’, क्योकि मेरा दोस्त सुनील शेट्टी का जबरदस्त फैन था. मैंने शुरू में बहुत मना किया की मैं नहीं जाऊंगा लेकिन फिर उसने अपनी कसम दे दी और कहा की सिर्फ मेरी वजह से उसका ये सपना पूरा नहीं हो पा रहा है. मैं इतना बर्दाश्त नहीं कर पाया और फिल्म बर्दाश्त करने चला गया उसके साथ छवीमहल में १५ रूपये का टिकट लेके.
उसने ज़िन्दगी में पहली बार सिनेमा-हाल में कदम रखा था और जब इंटरवल में हम बाहर आये तो मुझसे बोला,
“ठीक तो थी, तुम झुठ्ठे नरक मचाये थे, चलो जल्दी चला जाये अब पापा ऑफिस से निकल गए होंगे”
“कहाँ चलें, पूरा नहीं देखोगे क्या?”
“ख़त्म नहीं हुई का ? इ सब लोग कहाँ जा रहे हैं”
“अबे बुद्धि के बलिहारी ! इंटरवल हुआ हैं अभी, जंगल से आये हो का?”
इसके बाद मैंने उसे विस्तार से समझाया और उसने फिर कसम दी की ये बात मैं स्कूल में किसी को नहीं बताऊंगा.
उस दिन के बाद आज बता रहा हूँ. आज विमल के लेख में इसी तरह की बातें पढ़ के याद आ गया.
मुझे याद हैं बचपन में पूरे परिवार के साथ नटराज टाकीज़ में ‘वतन के रखवाले’ देखी थी और बहुत दिनों तक मिथुन का वो सीन याद करता रहा जिसमे वो दीवार पे छिपकली की तरह चढ़ जाता है. उसके बहुत दिनों बाद पापा ने मुझे ‘जुरासिक पार्क’ दिखाई थी. मेरे पिताजी आज भी बहुत शान से बताते हैं की उन्होंने फिल्मिस्तान टाकीज़ में लगने वाली हर फिल्म देखी अपने ज़माने में. सिनेमा और संगीत का चस्का उन्ही का उपहार है मेरे लिए, किताबें से भी दोस्ती उन्होंने ही करायी और आज उसी के कारण ज़िन्दगी के बड़े खुबसूरत एहसास हुए हैं.
मेरे दोस्त के पिताजी भी बड़े फिल्मबाज़ थे अपने ज़माने के, मगर बेटे के लिए अलग मापदंड थे और इसके कारण बेटा बहुत समय तक सिनेमा में अनपढ़ रहा.
वक़्त बदल गया है, केबल टी.वी. का ज़माना है...लेकिन सिनेमा-साक्षर होना उतना ही जरूरी है जितना किताबे पढना. ज़िन्दगी में जो कुछ भी हासिल किया उसमे किताबों और फिल्मो का बहुत बड़ा योगदान हैं और ये उपहार हर माँ-बाप को देना चाहिए अपने बच्चो को...उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए....लेकिन नहीं भी किया तो कोई बात नहीं....स्कूल तो है ही, दोस्त तो तैयार ही हैं....सिनेमा तो ज़िन्दगी का हिस्सा बनेगा ही !!!!!
उसने ज़िन्दगी में पहली बार सिनेमा-हाल में कदम रखा था और जब इंटरवल में हम बाहर आये तो मुझसे बोला,
“ठीक तो थी, तुम झुठ्ठे नरक मचाये थे, चलो जल्दी चला जाये अब पापा ऑफिस से निकल गए होंगे”
“कहाँ चलें, पूरा नहीं देखोगे क्या?”
“ख़त्म नहीं हुई का ? इ सब लोग कहाँ जा रहे हैं”
“अबे बुद्धि के बलिहारी ! इंटरवल हुआ हैं अभी, जंगल से आये हो का?”
इसके बाद मैंने उसे विस्तार से समझाया और उसने फिर कसम दी की ये बात मैं स्कूल में किसी को नहीं बताऊंगा.
उस दिन के बाद आज बता रहा हूँ. आज विमल के लेख में इसी तरह की बातें पढ़ के याद आ गया.
मुझे याद हैं बचपन में पूरे परिवार के साथ नटराज टाकीज़ में ‘वतन के रखवाले’ देखी थी और बहुत दिनों तक मिथुन का वो सीन याद करता रहा जिसमे वो दीवार पे छिपकली की तरह चढ़ जाता है. उसके बहुत दिनों बाद पापा ने मुझे ‘जुरासिक पार्क’ दिखाई थी. मेरे पिताजी आज भी बहुत शान से बताते हैं की उन्होंने फिल्मिस्तान टाकीज़ में लगने वाली हर फिल्म देखी अपने ज़माने में. सिनेमा और संगीत का चस्का उन्ही का उपहार है मेरे लिए, किताबें से भी दोस्ती उन्होंने ही करायी और आज उसी के कारण ज़िन्दगी के बड़े खुबसूरत एहसास हुए हैं.
मेरे दोस्त के पिताजी भी बड़े फिल्मबाज़ थे अपने ज़माने के, मगर बेटे के लिए अलग मापदंड थे और इसके कारण बेटा बहुत समय तक सिनेमा में अनपढ़ रहा.
वक़्त बदल गया है, केबल टी.वी. का ज़माना है...लेकिन सिनेमा-साक्षर होना उतना ही जरूरी है जितना किताबे पढना. ज़िन्दगी में जो कुछ भी हासिल किया उसमे किताबों और फिल्मो का बहुत बड़ा योगदान हैं और ये उपहार हर माँ-बाप को देना चाहिए अपने बच्चो को...उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए....लेकिन नहीं भी किया तो कोई बात नहीं....स्कूल तो है ही, दोस्त तो तैयार ही हैं....सिनेमा तो ज़िन्दगी का हिस्सा बनेगा ही !!!!!
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