परदेसी हो,
तो ध्यान रखना.
घर जाके
अपना सामान मत फैला देना
चारो तरफ,
अपने आने की खबर की तरह.
घर की जमीन
बड़ी उपजाऊ होती है.
दो दिन में ही हर चीज
जड़ जमा लेती है,
उग आते है
छोटी-छोटी पत्तियां और फूल.
फिर लौटते वक़्त
आसान नहीं होता
उजाड़ना ये बागीचा,
और घर हाथ पकड़ कर रोकता है
हर पौधे को.
हाथ छुड़ा कर
वापस लौटने का ये अफ़सोस,
परत दर परत इकठ्ठा हो रहा है,
इतनी परतों के नीचे
कितनी सांसे ले पाओगे?
- विवेक (22.03.19)
"You have your way. I have my way. As for the right way, the correct way, and the only way, it does not exist."
— Friedrich Nietzsche
— Friedrich Nietzsche
Friday, March 22, 2019
Monday, March 11, 2019
Tuesday, February 19, 2019
Wednesday, November 28, 2018
"तुम पिता थे"
तुम्हारे बच्चे भूखे थे,
और उन्हें यक़ीन था
तुम पर,
लेकिन जब तुम
उनके पैसों से,
रोटी की जगह,
अपने ख़ुदा के लिए
फूल खरीद लाये,
तब उन मासूमों ने आँखों से
जो भीगें हुए सवाल दागे,
उससे बहुत बड़ी दरारें पड़ गयीं
तुम्हारे मंदिरों में,
देखो उन दरारों को,
देर मत करो,
शायद उनमें अब भी
इतनी जगह हो,
कि तुम्हारी आत्मा निकल सके बाहर,
और आज़ाद हो जाये !!!
- विवेक (26.11.18)
Tuesday, August 22, 2017
ज़िन्दगी कुछ कह रही थी
एक दिन जब रात की छत टिमटिमा कर गा रही थी.
चाँद की हल्की सी आहट बादलों से आ रही थी.
गुनगुनाती याद उसकी चांदनी पर बह रही थी.
उस घड़ी उस वक़्त शायद ज़िन्दगी कुछ कह रही थी.
एक दिन जब मेरा कमरा सिर्फ मुझको सुन रहा था.
एक झरोखा कोई सपना धूप के संग बुन रहा था.
दो परिंदों की ठिठोली खिडकियों पे रह रही थी.
उस घड़ी उस वक़्त शायद ज़िन्दगी कुछ कह रही थी.
एक दिन जब चार आँखे एक आंसू रो रहीं थी.
खूबसूरत थी उदासी मुस्कुराहट सो रही थी.
रौशनी की हर ईमारत जब क्षितिज पर ढह रही थी.
उस घड़ी उस वक़्त शायद ज़िन्दगी कुछ कह रही थी.
- विवेक (२००१)
Sunday, August 13, 2017
आखिरी पन्ने पे जाके मिला है पहला सबक,
ख्वाहिशे बोने पे अफ़सोस के फूल आते हैं.
घर पे वापस बुला ले कोई इसलिए हर बार,
अपनी कोई चीज़ रख देते हैं, भूल आते हैं.
शहर में आना ही इक जुर्म है इतना गहरा,
कोई गुनाह करे, हम क़ुबूल आते हैं.
रहनुमाओं से सबक सोच-समझ के लेना,
एक ही रंग में साजिश और उसूल आते हैं.
- विवेक
१३.०८.२०१७
ख्वाहिशे बोने पे अफ़सोस के फूल आते हैं.
घर पे वापस बुला ले कोई इसलिए हर बार,
अपनी कोई चीज़ रख देते हैं, भूल आते हैं.
शहर में आना ही इक जुर्म है इतना गहरा,
कोई गुनाह करे, हम क़ुबूल आते हैं.
रहनुमाओं से सबक सोच-समझ के लेना,
एक ही रंग में साजिश और उसूल आते हैं.
- विवेक
१३.०८.२०१७
Thursday, January 7, 2016
‘सुख’
सुख
एटीएम का वो परचा नहीं है
जो महीने की पहली तारीख को निकलता है।
सुख
वो घर भी नहीं
जो परदेस में बसाया हो।
सुख
धूप का वो टुकड़ा है
जो जाड़े की दोपहरी में
बाबा के साथ सोते हुए
उनकी शाल के छेद से आकर
मेरी पीठ सहलाता था।
और जिन्दगी
इक तलाश है,
उसी धूप के टुकड़े की।
एटीएम का वो परचा नहीं है
जो महीने की पहली तारीख को निकलता है।
सुख
वो घर भी नहीं
जो परदेस में बसाया हो।
सुख
धूप का वो टुकड़ा है
जो जाड़े की दोपहरी में
बाबा के साथ सोते हुए
उनकी शाल के छेद से आकर
मेरी पीठ सहलाता था।
और जिन्दगी
इक तलाश है,
उसी धूप के टुकड़े की।
Sunday, December 1, 2013
चोर-पुलिस
चुनाव के बाद मुमकिन है
बदल जाये बहुत कुछ.
चोर बन जाए पुलिस,
और पुलिस पहन ले चोर की पोशाक.
पर नहीं बदलेंगे
लूटे जाने वाले,
और जिंदा रहेगी,
नए तरीकों से
लुटने की तमन्ना !
...चलो एक बार फिर से
वोट दे आयें हम-दोनों !
बदल जाये बहुत कुछ.
चोर बन जाए पुलिस,
और पुलिस पहन ले चोर की पोशाक.
पर नहीं बदलेंगे
लूटे जाने वाले,
और जिंदा रहेगी,
नए तरीकों से
लुटने की तमन्ना !
...चलो एक बार फिर से
वोट दे आयें हम-दोनों !
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